संस्कृति का संकट और साहित्य का दायित्व
संस्कृति का संकट और साहित्य का दायित्व जाहिर है आज के समय को पहचानना आसान नहीं है। आज के समय की पहचान इस लिए भी कठिन है क्योंकि तमाम वैचारिक आख्यानों से लैश आज का समय एकरेखीय नहीं है। हमारा समय बाजार की चकाचौंध में ऑखें मिचमिचा रहा है तो आज्ञाकारी उपभोक्ता की तरह बाजार में छितराये कार्टूनों के हसीन करतबों में गोते लगा रहा है। कुछ लोग आज के समय के करतबों पर मुग्ध होकर नारे लगा रहे हैं कि यह समय खुद के वैभव व पराक्रम को प्रमाणित करने का समय है, यानि खुद में जीने मरने और बाजार का वसंत पीने का समय है यह। तो इस तरह से समय बदल रहा है सो संस्कृति भी प्रकृति की कुदरती भूमिकाओं को छलांगते हुए अपने मूल रूपों को लगातार बदल रही है। समय के हिसाब से बदल जाना संस्कृति की मजबूरी है। संस्कृति की सारी सीखें समय की गिरफ्त में किसी बंधुआ मजूर की तरह फंसा दी जाती हैं ऐसी स्थिति में संस्कृति किसी बेजान वस्तु की तरह विवश होकर समय की आज्ञाकारिता के अलावा कुछ कर नहीं सकती। ऐसी सूरत में कहा जाना चाहिए कि संस्कृति का जो रूप, जो ताल व लय तथा राग, उपनिवेशी सत्ता ...